Wednesday, December 19, 2012

ब्रिटिश भारत मे आरक्षण के जनक और स्वतंत्र भारत मे ओबीसी आरक्षण के सरंक्षक - पेरि‍यार रामस्वामी नायकर

ब्रिटिश भारत मे आरक्षण के जनक और स्वतंत्र भारत मे ओबीसी आरक्षण के सरंक्षक
 पेरि‍यार रामस्वामी नायकर
जन्म-17 सितंबर 1879 : मृत्यु – 24 दिसंबर 1973

ओबीसीओं भूलो मत... आरक्षण लाभार्थिओ भूलो मत...
पेरियार रामस्वामी नायकर'को भूलो मत...
पेरियार रामस्वामी नायकर ही है, जिनकी बदौलत
ब्रिटिश भारत मे आरक्षण लागु है...
स्वतंत्र भारत मे ओबीसी आरक्षण सुरक्षित है...

पेरियार रामस्वामी नायकर  
(24 डिसंबर 2012) स्मृतिदिन के अवसरपर
तमाम ओबीसी - आरक्षण लाभार्थिओकों द्वारा 
पेरियार रामस्वामी नायकर'जीं'के स्मृतिको
विनम्र अभिवादन !

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ब्रिटिश भारत मे आरक्षण के जनक और स्वतंत्र भारत मे ओबीसी आरक्षण के सरंक्षक
 पेरि‍यार रामस्वामी नायकर
ब हिन्दुस्थान, ब्रिटिश भारत और स्वतंत्र स्टेटों मे बटा था. ब्रिटिश भारत पर ब्रिटिशोंकी पुरी हुकूमत थी. जबकी स्वतंत्र स्टेटोंपर राजों - नवाबोंका राज था. छत्रपती शाहू महाराज ने अपने कोल्हापुर स्टेट में 26 जुलाई 1902 को आरक्षण लागू किया था. मैसोर के वाडियार राजाने मैसोर स्टेटमें 1924 में आरक्षण लागू किया था. लेकिन ब्रिटिश भारत में जिनके कारण आरक्षण लागू हुवा, उनका नाम है, पेरियार रामस्वामी नायकर. जिसके तहत न सिर्फ ओबीसीं को आरक्षण मिला, बल्कि दलित, मुस्लिम, ख्रिश्चन और ब्राह्मणों को भी आरक्षण मिला था. लेकिन स्वतंत्र भारत में ओबीसी आरक्षण को धोका हुवा. वो पेरियार रामस्वामी नायकर ही है, जिनके कारण स्वतंत्र भारत में ओबीसी आरक्षण का संरक्षण हुवा. अथ: पेरियार रामस्वामी नायकर को ब्रिटिश भारत में आरक्षण  के  जनक और स्वतंत्र भारत मे ओबीसी आरक्षण के सरंक्षक कह सकते है.

ब्रिटीश भारत में शासन चलाने के लि अंग्रेज अधिकारियों को बड़ी तादाद पर तैनात किया गया था. उसके बावजूद प्रशासकीय कार्य में जादा लोगों की रुरत महसूस हुयी. ब्रिटीश शासन में भाषा तथा अन्य मुद्दों को लेकर समस्या भी पैदा होने लगी. ब्रिटीश प्रशासन में नोकरियों में भारतीय लोगोंकी जरुरत महसूस हुयी. तब नोकरियों में छोटे पदोंपर भारतीय लोगोंकी भरती चालू की. ब्रिटीश प्रशासन में नोकरियों में आरक्ष की मांग, भारत में सबसे पहले ब्राह्मण वर्ग ने की. (ब्रिटीश प्रशासन में नोकरियों में शुद्र – अतिशुद्रोंके आरक्ष की मांग, भारत में सबसे पहले महात्मा जोतीराव फुले ने की थी) तब ब्राह्मणे वर्ग को (अब्राह्मण) लोकसंख्या के अनुसार प्रशासन में प्रतिनिधित्व मिले, इसलि पेरियार रामस्वामी नायकर ने न्म (17 सितंबर 1879) मुवमेंट लायी,बड़ा संघर्ष किया. उसके परिणामत: 1 एप्रिल 1927 में मद्रास पेसींडेंसी के असेम्बली (मद्रास राज्य/प्रांत मे केरल, कर्नाटक, आंध्र, ओरिसा तथा तामिलनाडू का विशाल क्षेत्र व्याप्त था) एक कम्युनल जी..निकाला गया। जिसके द्वारा 12 आरक्षित जगहों की रोस्टर (बिंदु नामावली) निश्चित की गयी. उसमें ओबीसी - 5, ख्रिश्‍चन - 2, मुस्लि - 2, अस्पृश्य - 1 और ब्राह्मण - 2, गह दिये गये. डॉ.पी.सुब्बरायन के मंत्रिमंडल में शामि पेरिया रामस्वामी नायकर के साथी श्री. मुदलीयार कॅबिनेट मंत्री थे, उन्होंने इस कायदे को लागू किया. इस तरह भारत की नोकरीओं में पहली आरक्षण निती सरकारी आदेश द्वारा लागू हुयी.  इससे ओबीसीओं को सबसे जादा 5 गह प्राप्त हुए थे.

भारत का नोकरीओं मे पहला आरक्षण :मद्रास प्रेसींडेसी कम्युनल जी.. 1 एप्रिल 1927
12 आरक्षित जगहो का रोस्टर बिंदू
ओबीसी  - 5 जगह
ब्राह्मण - 2 जगह, मुस्लीम - 2 जगह, ख्रिश्‍चन - 2 जगह, अस्पृश्य - 1 जगह

 वर्ष 1918 तक ब्रिटिश भारत पर ब्रिटीशों का शासन तथा प्रशासन क्षेत्र में संपूर्ण नियंत्रण था. भारतीयों को शासन- प्रशासन में शामि करने का निर्णय ब्रिटीश राजकर्तांओं ने 1919 में लिया. मान्टेग्यु चेम्‍सफोर्ड  रिपोट द्वारा सि, मुस्लि, ख्रिश्‍चन, अँग्लो इंडियन, युरोपिअन, ज्‍यु और अश्‍पृश्‍य को स्वतंत्र समाज का (कम्युनिटीका) दर्जा देकर रानैति आरक्षण (प्रतिनिधित्व) निती लागु हुयी. भारत के प्रधानमंत्री रॅम्से मॅकडोनाल्ड ने 17 अगस्त 1932 में कम्युनल अवार्ड अंतर्गत अस्पृश्यों के लि स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र घोषि किया. गांधी-आंबेडकर के दरम्यान हुये पुणे करार द्वारा उसे संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र बनाया गया. सि, मुस्लि, ख्रिश्‍चन, अँग्लो इंडियन, युरोपियन, ज्‍यु तथा अस्पृश्यों को दिया गया कम्युनल अवार्ड राजनैतिक आरक्षण (प्रतिनिधित्व) था.

स्वतंत्र भारतमें नये राजघटना के अनुसार मद्रास प्रेसीडेंसीमे लागु हुवा, ओबीसी आरक्षण रद्द होनेका हायकोर्ट ने आदेश निकाला. उसके खिलाप मद्रास राज्यमे बड़ा आन्दोलन किया गया. परिणामत: केन्द्रीय सरकारको मजबूर होकर भारतीय राजघटनामें पहेला बदलाव का प्रस्ताव पास करना पड़ा और ओबीसी आरक्षण स्वतंत्र भारत में पुन: एक बार लागु हुवा. भारतका जी. ओ. द्वारा पहेला आरक्षण मद्रास प्रेसीडेंसी में लागु हुवा. जिसके मूल शिल्पकार थे, पेरियार रामस्वामी नायकर ! जिनके चलते स्वतंत्र भारतमें ओबीसी आरक्षण सुरक्षित हुवा. उस महापुरुषका नाम है, पेरियार रामस्वामी नायकर ! समाजविघातक, कालबाह्य, पुराने हुए मान्‍यताओं पर पेरियार रामस्‍वामी नायकर जैसा कठोर आघात शायद ही किसी और ने किया होगा. सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक, महिला तथा युवा वर्ग के क्षेत्र में पेरियार का कार्य केवल अतुलनीय कहा जा सकता है. लेकिन ब्राह्मणेतर समाज को नोकरी तथा शिक्षण क्षेत्र में आरक्षण (प्रतिनिधित्‍व) प्राप्‍त कर देने का पेरियार रामस्‍वामी नायकर का कार्य भारत के सामाजिक तथा राजनैतिक इतिहास में एक महत्‍वपूर्ण पर्व माना जाए ऐसा है. 

ब्राह्मणेतर समाज के प्रतिनिधित्‍व के लिए पेरियार रामस्‍वामी मिटिंगज्, सभाओं द्वारा जनमत तयार कर रहे थे. कांग्रेस पार्टी ने खुद ब्राह्मणेतर समाज के लिए आरक्षण निती का पुरस्‍कार करना चाहीए, ऐसी मांग गांधी तथा कांग्रेस के अनुयायी के नाते पेरियार रामस्‍वामी नायकर कर रहे थे. इसी मांग को लेकर पेरियार रामस्‍वामी नायकर के प्रयत्‍नवश मद्रास राज्‍य के वार्षिक कांग्रेस अधिवेशन में (थिरुनेलवेल्‍ली - 1920) पहला आरक्षण रिझोल्‍युशन को ठुकरा दिया गया. उसके बाद मद्रास राज्‍य के हर वार्षिक कांग्रेस अधिवेशन में आरक्षण रिझोल्‍युशन (1921 - तंजावर), (1922 - थिरुवर), (1921 - सेलम), (1924 - थिरुवण्‍णामलाई (, 1925 कांचीपुरुम ) में लगातार रखा गया, लेकिन हर बार उसे ठुकरा दिया गया. 1924 के वार्षिक अधिवेशन में मद्रास प्रांत कांग्रेस के अध्‍यक्ष रामस्‍वामी नायकर ही अध्‍यक्ष थे. उन्‍होंने अपने अध्‍यक्षीय भाषण में जाती आधारित आरक्षण (प्रतिनिधित्‍व) की जरुरत तथा महत्‍व को विस्‍तार से तर्क के साथ पेश किया. उसके बावजुद आरक्षण रिझोल्‍युशन को मंजुरी नहीं मिली. 

तब हिन्दुस्थान, ब्रिटिश भारत और स्वतंत्र स्टेटों मे बटा था. ब्रिटिश भारत पर ब्रिटिशोंकी पुरी हुकूमत थी. जबकी स्वतंत्र स्टेटोंपर राजों - नवाबोंका राज था. छत्रपती शाहू महाराज ने अपने कोल्हापुर स्टेट में 26 जुलाई 1902 को आरक्षण लागू किया था. मैसोर के वाडियार राजाने मैसोर स्टेटमें 1924 में आरक्षण लागू किया था. लेकिन ब्रिटिश भारत में जिनके कारण आरक्षण लागू हुवा, उनका नाम है, पेरियार रामस्वामी नायकर. जिसके तहत न सिर्फ ओबीसीं को आरक्षण मिला, बल्कि दलित, मुस्लिम, ख्रिश्चन और ब्राह्मणों को भी आरक्षण मिला था. लेकिन स्वतंत्र भारत में ओबीसी आरक्षण को धोका हुवा. 
वो पेरियार रामस्वामी नायकर ही है, जिनके कारण स्वतंत्र भारत में ओबीसी आरक्षण का संरक्षण हुवा. अथ: पेरियार रामस्वामी नायकर को ब्रिटिश भारत में आरक्षण  के  जनक और स्वतंत्र भारत मे ओबीसी आरक्षण के सरंक्षक कह सकते है.

1925 के कांचीपुरम कांग्रेस वार्षिक अधिवेशन में टी.व्‍ही. मुदलियार सभाध्‍यक्ष थे. आरक्षण नीती के मंजूरी के लिए उन्‍होंने 30 मतों के आवश्‍यकता होने की बात की. रामस्‍वामी नायकर ने तुरंत 50 मतों को इकठ्ठा किया. आरक्षण के पक्ष में बहुमत सिध्‍द हुआ. लेकिन कुछ लोगों ने शोर मचाकर आरक्षण के रिझोल्‍युशन को नामंजूर होने की घोषणा की. इससे पेरियार रामस्‍वामी नायकर महासंतप्‍त हुये. कांचिवरम अधिवेशन को बिचोबीच छोडकर अपना निषेध व्‍यक्‍त करते हुए रामस्‍वामी नायकर तथा उनके साथी अधिवेशन से बाहर चले आये. केरल के वायकोम मंदीर सत्‍याग्रह और गुरुकूलम प्रकरण में नाराज / संतप्‍त रामस्‍वामी नायकर ने कांग्रेस का साथ नहीं छोडा था. लेकिन आरक्षण मुद्देपर कांचिपुरम अधिवेश्‍न का सभात्‍याग करनेवाले पेरियार रामस्‍वामी नायकर’ने न केवल गांधी तथा कांग्रेस का त्‍याग किया. बल्कि कांग्रेस का सर्वनाश करने की भिष्‍मप्रतिज्ञा की थी.

पेरियार रामस्‍वामी नायकर’ने बहोत सारे क्षेत्रों में कार्य किया. लेकिन ब्राह्मणेतर समाज को नोकरी, शिक्षण तथा प्रशासकीय क्षेत्र में प्रतिनिधीत्‍व / भागीदारी दिलाने के लिए जाती आधारित आरक्षण नीति का पुरस्‍कार करने में / उसका आग्रह करने में पेरियार रामस्‍वामी नायकर सबसे आगे थे. पेरियार का यह सबसे बड़ा कार्य था. मद्रास प्रांत में 1 अप्रेल 1927 में कानून द्वारा लागु हुआ. आरक्षण (ओबीसी का) रामस्‍वामी नायकर के अथक संघर्ष का फलीत था.

15 अगस्‍त 1947 को भारत स्‍वतंत्र हुआ. स्‍वतंत्र भारत का संविधान बनाया गया. अनुसूचित जाती (15) और अनुसूचित जमाती (7.5%) आरक्षण भारतीय संविधान में शामिल करने में डॉ. बी. आर. आम्‍बेडकर सफल हुए. 52 प्रतिशत ओबीसीओंको आरक्षण वंचित रखा गया. संविधान के 340 कलम के अनुसार ओबीसीओं की (सोशल अॅण्‍ड एज्‍युकेशनली बैकवर्ड क्‍लास की) सूचि बनाने का कार्य भारत के राष्‍ट्रपति को तथा सरकार को संविधानतः सौंपा गया. (मद्रास प्रांत में बैकवर्ड क्‍लास की (ओबीसी) सुची तैयार थी. कोल्‍हापुर संस्‍थान में 1902 से तथा मैसोर संस्‍थान में 1924 से ओबीसीओं की सुची तैयार थी.) भारत के संविधान द्वारा एस.सी. तथा एस.टी को स्‍पष्‍ट तथा निःसंदीग्‍ध्‍ स्‍वरुप में आरक्षण लागु हुआ था. लेकिन ओबीसीओं के साथ वैसे नहीं हुआ था.

स्‍वतंत्र भारत में भारत का नया संविधान लागु हुआ. संविधान के 16(1) के नुसार `सबको समान अवसर' इस तत्‍व का आधार लेते हुए, 1927 के आरक्षण विरोध में मद्रास हायकोर्ट में (1950) याचिका दायर की, मद्रास हायकोर्ट ने (भारत के नये संविधान के पृष्‍ठभूमि पर) मद्रास असेम्‍बली का दिनांक 1 अप्रेल 1927 का सरकारी (आरक्षण) अध्‍यादेश रद्द होने का आदेश दिया. पेरियार और उनके साथियों ने इसके खिला'फ सुप्रिम कोर्ट में अपिल की. परंतु सुप्रिम कोर्ट ने भी मद्रास हायकोर्ट के निर्णय को कायम किया. इस निर्णय से संपुर्ण मद्रास प्रांत में खलबली मच गयी. असंतोष निर्माण हुआ. पेरियार रामस्‍वामी नायकर का क्रोधाग्‍नी भडक उठा. भारत के नये संविधाननुसार एस.सी./ एस.टी. आरक्षण निती मद्रास के साथ संपूर्ण भारत में लागु हुई थी. लेकिन सुप्रिम कोर्ट के आदेशानुसार ओबीसी का आरक्षण खतरे में आया था. सुप्रिम कोर्ट के इस निर्णय के खिला'फ रामस्‍वामी नायकर ने सिंहगर्जना की. 13 अगस्‍त 1950 को मद्रास शहर में आयोजित प्रचंड सभा में पेरियार रामस्‍वामी नायकर के मुख से क्रोधाग्‍नी प्रकट हो रहा था. भारतीय जनतंत्र तथा प्रशासन और न्‍याय व्‍यवस्‍था पर से विश्‍वास उड जाने की बात करते हुए ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर स्‍वतंत्र राज्‍य की मांग किये जाने की घोषणा रामस्‍वामी नायकर ने की.

पेरियार ने कहा, "The present agitation is not agitation mere communal Government Order (G.O.). It will lead us to agitate for the separation of Dravidnad."  पेरियार रामस्‍वामती नायकर तथा उनके साथियों ने संपूर्ण मद्रास प्रांत में आंदोलन खड़ा किया. पेरियार के इस महाआंदोलन तथा सिंहगर्जना के सामने भारत सरकार को झुकना पडा. भारत के संविधान में पहला अमेंडमेंट करना पडा. संविधान अधिनियम 1951 के अनुसार सेकशन 15(4) के द्वारा नोकरीओं में तथा शिक्षण में ओबीसीओं के संविधानात्‍मक आरक्षण के अधिकार को मान्‍यता मिेली. ओबीसी का आरक्षण बच गया.
ब्राह्मणेतर जाती समुह / वर्ग के न्‍याय्य प्रतिनिधित्‍व का मुद्दा पेरियार रामस्‍वामी नायकर के मिशनका सबसे बड़ा, महत्‍वपूर्ण तथा अहम अजेंडा था. इस आरक्षण को लेकर पहले पेरियार रामस्‍वामी नायकर ने कांग्रेस को छोडा था और बादमें ओबीसी आरक्षण को लेकर भारतीय संघराज्‍य से बाहर जाने की घोषणा की थी. इससे, इस मुद्दे पर पेरियार कितने संवेदनशील थे, इसका स्‍पष्‍ट दर्शन होता है.
ब्रिटीश राज्‍यकर्ता चले गये. अॅग्लो इंडियन को आरक्षण देकर चले गये. मुसलमानों को पाकिस्‍तान - बांगला देश देकर चले गये. बावजूद उसके मुसलमानों को भारत में भी रखा गया. सिखों के लिए अलग पंजाब राज्‍य बनाया. अनुसूचित जाती / जनजाती को राजनैतिक (लोकसभा, विधानसभा), नोकरीओं में (प्रशासन में), शिक्षण क्षेत्र में आरक्षण दिया गया. लेकिन 52 ओबीसीओं को, बहुजन हिंदू समाज को प्रतिनिनिधित्‍व / आरक्षण वंचित रखा गया. परिणामतः ओबीसी जीवन के हर क्षेत्र में "सब‍से जादा पिछडा गया वर्ग " बनकर रह गया. रामस्‍वामी नायकर के कार्य फलतः तामिलनाडू तथा कर्नाटक राज्‍य में सुप्रिम कोर्ट के आरक्षण में 50 प्रतिशत सिलींग के लागु न होने से ओबीसीओं को आरक्षण का थोडासा 'फायदा मिला. इसी क्षेत्र से अंतरराष्‍ट्रीय दर्जे का ब्रेन बैंक ओबीसी ने भारत तथा विश्‍वभर को दिया है.

उत्‍तर भारत में पिछडा वर्ग आंदोलन में नया नेतृत्‍व खड़ा हुआ है. महाराष्‍ट्र में ओबीसी नेतृत्‍व खड़ा हो रहा है. मुलायम, लालू, भुजबल जैसे नेतृत्‍व को मान्‍यता मिल रही है. लेकिन ओबीसीको आज तक न्‍याय नहीं मिला है. आरक्षण का लाभ नहीं मिला है. उच्‍च शिक्षण में ओबीसी आरक्षण आज भी खतरे में है. Privatisation, Liberalisation and Globalisation निती के चलते आरक्षण निती का सही अर्थ नष्‍ट हुआ है. ओबीसी नेतृत्‍व को (सामाजिक तथा राजनैतिक) ओबीसी आरक्षण लागु कर लेने में आजतक सफलता नहीं मिली है. इस पृष्‍ठभुमीपर पेरियार रामस्‍वामी नायकर के ओबीसी आरक्षण संबंधी कार्य को देखने की / समजने की जरुरत महसूस होती है. नोकरी, शिक्षा तथा सत्‍ता में (शासन, प्रशासन,शिक्षण क्षेत्र में) प्रतिनिधित्‍व, ये सामाजिक मुवमेंट का सबसे बड़ा महत्‍वपूर्ण पहेलु है. उसे प्राप्‍त करने के उद्देश्‍य से पेरियार रामस्‍वामी नायकर, अलग राज्‍य की बात करने को तैयार होते है. इस बात से पेरियार खुद को राष्‍ट्रविरोधी माने जाने के खतरे को स्विकारने को तैयार हुये थे. स्‍वसन्‍मान तथा सामाजिक न्‍याय तथा प्रतिनिधित्‍व के लिए पेरियार कितने आग्रही तथा कर्मट थे, इसका भी दर्शन होता है.
 
देश में तथा विदेश में जाकर समाज जागृती का कार्य करनेवाले पेरियार रामस्‍वामी नायकर का निर्वाण 95 वे वर्ष के वयोकाल में 24 दिसंबर 1973 को हुआ. 1987 के वर्ष में भारत सरकार ने पेरियार के कार्य गौरवार्थ 25 रुपये का पोस्‍टल टिकट प्रकाशित किया गया था.
 
डॉ.बी.आर.आंम्‍बेडकर का कार्य राष्‍ट्रीय तथा राष्‍ट्रव्‍यापी हुआ. परिणामतः अनुसूचित जाती की मुवमेंट भी राष्‍ट्रव्‍यापी बनी. साथ ही साथ उसका लाभ अनुसूचित / जनजाति को भी मिला. लेकिन, ओबीसी की मुवमेंट राष्‍ट्रव्‍यापी तथा राष्‍ट्रीय नहीं बनी. इस परिप्रेक्ष्‍य में पेरियार रामस्‍वामी नायकर का कार्य 52 प्रतिशत ओबीसीओं के लिए मार्गदर्शक दिपस्‍तंभ बन सकता है.
 
ओबीसी के साथ अन्‍य वर्ग को भारत का पहला नोकरीओं में आरक्षण प्राप्‍त कर देने वाले (कम्‍युनल जी.ओ. 1 अप्रेल 1927) पेरियार रामस्‍वामी नायकर का राष्‍ट्रीय तथा राष्‍ट्रव्‍यापी स्‍वरुप छुप गया है / छुपाया गया है. द्रविडनाड की माँग, हिन्दी विरोध और अघोर नास्तिकतावाद के कारण शायद पेरियार रामस्‍वामी नायकर की प्रतिमा उर्वरित भारतमें अलगसी बन गयी थी. पेरियार सरल स्वभाव के थे, बड़े तात्विक थे, तर्कनिष्ट (Rational) थे, मानवता के बड़े समर्थक थे. ढोंग के सक्त खिलाफ थे. शायद इस लिए वे अपनी बात पर अड़िग रहते थे. धार्मिक तथा सामाजिक क्षेत्र के क्रांतीकारी / बंडखोर पेरियार की पहेचान पुरे भारत भर में कम - जादा पायी जाती है. उन्होने देव/ईश्वर के अस्तित्वको नकारा था. धर्मकों नकारा था. पुरुष सत्ताधीष्टित समाज को नकारा था. महिला वर्ग के अधिकार को लेकर वो बहोत ही सवेन्दनशील थे. शिक्षा को वो सर्वोपरि मानते थे. चातुरवर्णाधीष्टित जाती व्यवस्था के सक्त खिलाफ होने कारण वो ब्राह्मण वर्चस्व के कठोर विरोधक रहे. वायकोम सत्याग्रह के अग्रणी पेरियार ही थे. ब्राह्मणबनिया के खिलाफ उनका संघर्ष चला. इसलिए पेरियार रामस्‍वामी नायकर की प्रतिमा उर्वरित भारतमें अलगसी पड़ गयी. लेकिन ओबीसी आरक्षण के आद्य सेनापती / पायोनियर स्‍वरुप पेरियार रामस्‍वामी नायकर की पहेचान छुपी हुई है. पेरियार के कारण न सिर्फ ओबीसी को आरक्षण मिला, बल्कि दलित, मुस्लिम, ख्रिश्चन तथा ब्राह्मण को भी आरक्षण मिला. इस तरह पेरियार और आरक्षण का अटुट संबंध है. और उससे भी जादा ओबीसी आरक्षण से पेरियार का संबंध अटुट है.
लेखन - एस.एल.अक्कीसागर
अध्यक्ष – ऑल इन्डिया रिजर्व बैंक ओबीसी एम्प्लोयीज वेलफेअर असोसिएशन, मुंबई.  
Email : sidakki@yahoo.com

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 पेरियार रामस्‍वामी नायकर की  जाती कोनसी ? 
पेरियार रामस्‍वामी नायकर की  जाती कोनसी है ! इसके बारेमे संभ्रम है. विकीपीडिया में उनको बलिजा/ बनिजगा/ बनिया जातीके बताया है. नायकर होने के कारण नायडू/ नायकर जातीसे भी जोड़ा गया है. विजयनगर साम्राज्य में जाकर उन्हे क्षत्रिय भी बताया गया है. चातुरवर्णाधीष्टित जाती व्यवस्था के सक्त खिलाफ होने कारण पेरियार रामस्‍वामी नायकर ब्राह्मण वर्चस्व के कठोर विरोधक रहे. वायकोम सत्याग्रह के अग्रणी पेरियार ही थे. ब्राह्मणबनिया के खिलाफ उनका संघर्ष चला. चातुरवर्णाधिष्टित जाती व्यवस्था में से शूद्र – अति शूद्र जाती वर्ग के लिए उनका संघर्ष चला. ईश्वर नहीं, आत्मा नहीं, जाती नहीं, ये उनकी विचार त्रिसुत्री थी. इसलिए नायकर-त्व को त्याग कर वो पेरियार रामस्वामी कहलवाने लगे थे. उत्तर भारतमे पेरियार रामस्‍वामी नायकर को धनगर जातीका मानते है, पेरियार रामस्‍वामी नायकर की प्रतिमा लेकर वे सामाजिक मूवमेंट चला रहे है.  कर्नाटकमे उन्हे नायकर/बेडर/रामोशी जातीका मानते है, पेरियार रामस्‍वामी नायकर की प्रतिमा लेकर वे सामाजिक मूवमेंट चला रहे है.  जबकी तमिलनाडूके धनगर/ कुरुम्बन पेरियार रामस्‍वामी नायकर को धनगर जातीका नहीं मानती. उसी तरह महाराष्ट्र के नायकर/बेडर/रामोशी पेरियार रामस्‍वामी नायकर को नायकर/बेडर/रामोशी जातीका नहीं मानती. पेरियार रामस्‍वामी नायकर जातीसे नहीं, अपने कार्य – कर्तृत्वसे महापुरुष -पेरियार बने थे. जातीका अभिमान ठीक है. किसी महापुरुष के अपने जातीके होने से गौरवान्वयित होना भी ठीक है. लेकिन महापुरुष अगर अपनी जातीका होनेसे ही उनको माना जाना, क्या ठीक है ? किसी भी महापुरुष – पेरियार की पहचान जाती/वर्ण/वंश/धर्म/ भाषा/प्रांत/प्रदेश/देश से नहीं, उसके कार्य – कर्तृत्वसे होती है, होनी चाहिये. पेरियार रामस्‍वामी नायकर की लढाई, आत्मसन्मान की लढाई थी. मूलत: मानवता के लिए उनका संघर्ष था. इन मूल मानवी जीवन मूल्योंके के खिलाफ जो कार्य कर रहे थे, उनके विरुद्ध उन्होने जीवनभर संघर्ष किया. इस बात को समझने से ही पेरियार रामस्‍वामी नायकर का चरित्र हम जान सकते है. पेरियार रामस्‍वामी नायकर के चरित्र को जान कर ही उनको मानने मे हम सब की भलाई है.
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एस.एल.अक्कीसागर

1 comment:

  1. एस.एल.अक्कीसागरजी , धन्यवाद.

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